Renuka Singh Thakur Emotional Life Story : सिर्फ 3 साल की उम्र में सिर से उठा पिता का साया, मां ने मजदूरी कर बेटी को बनाया वर्ल्ड चैंपियन; भावुक कर देगी रेणुका सिंह ठाकुर की कहानी
भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने जब से इतिहास रचा है, तब से देश की कई महिला खिलाड़ियों के संघर्ष की कहानियां सामने आ रही हैं। लेकिन टीम इंडिया की रफ्तार की सौदागर और तेज गेंदबाज रेणुका सिंह ठाकुर (Renuka Singh Thakur) की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी के सफल होने की दास्तान नहीं है, बल्कि यह एक मां के कभी न हार मानने वाले जज्बे और एक बेटी के अपने दिवंगत पिता के सपने को पूरा करने की सबसे भावुक यात्रा है.
आज रेणुका जब भी मैदान पर विकेट लेती हैं, तो आसमान की तरफ देखती हैं. उनके हाथ पर बना एक खास टैटू उनके जीवन की पूरी हकीकत बयां करता है. आइए जानते हैं हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकलकर दुनिया की सबसे खतरनाक गेंदबाजों में शामिल होने वाली रेणुका सिंह ठाकुर की पूरी कहानी।
Renuka Singh Thakur Emotional Life Story

3 साल की उम्र में पिता को खोया, मां ने संभाली जिम्मेदारी
रेणुका सिंह ठाकुर का जन्म हिमाचल प्रदेश के रोहड़ू के पास एक छोटे से गांव ‘पारसा’ में हुआ था. उनके पिता केहर सिंह क्रिकेट के बहुत बड़े दीवाने थे. वह विनोद कांबली के इतने बड़े फैन थे कि उन्होंने अपने बेटे का नाम भी विनोद रखा था और वह चाहते थे कि उनके बच्चे बड़े होकर देश के लिए क्रिकेट खेलें.
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब रेणुका महज 3 साल की थीं, तब उनके पिता का अचानक निधन हो गया. पिता के जाने के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। दो छोटे बच्चों को पालने की पूरी जिम्मेदारी मां सुनीता ठाकुर के कंधों पर आ गई. मां को पति की जगह क्लास-4 की सरकारी नौकरी मिली, जहां बेहद मामूली सैलरी में उन्होंने दोनों बच्चों की परवरिश की.
भाई ने अपनी बहन के लिए छोड़ दिया अपना सपना
रेणुका बचपन में अपने गांव में लड़कों के साथ क्रिकेट खेला करती थीं और कई बार मैच खेलने के लिए दूसरे गांवों में भी चली जाती थीं. उनके भाई विनोद भी क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन घर के तंग आर्थिक हालातों को देखते हुए भाई ने अपनी बहन के टैलेंट को आगे बढ़ाने के लिए खुद का सपना कुर्बान कर दिया.
जब रेणुका 12 साल की थीं, तब उनके चाचा भूपेंद्र ठाकुर ने उनके हुनर को पहचाना और उनका दाखिला धर्मशाला स्थित ‘हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन’ (HPCA) की विमेंस एकेडमी में करवा दिया. इसी एकेडमी ने भारत को सुषमा वर्मा और हरलीन देओल जैसी स्टार खिलाड़ी भी दी हैं.
जहीर खान को मानती हैं आदर्श, चोट ने जब तोड़ना चाहा हौसला
रेणुका बचपन से ही भारत के दिग्गज तेज गेंदबाज जहीर खान को अपना आदर्श मानती आई हैं. साल 2019-20 के घरेलू सीजन में उन्होंने रेलवे की तरफ से खेलते हुए 23 विकेट चटकाए और टूर्नामेंट की लीडिंग विकेट-टेकर बनीं, जिसके बाद उन्हें टीम इंडिया का टिकट मिला. उन्होंने महान मिताली राज के हाथों अपनी वनडे कैप हासिल की. साल 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में ऑस्ट्रेलिया के टॉप ऑर्डर को अकेले तहस-नहस (4 विकेट) कर रेणुका ने दुनिया को चौंका दिया और ICC ने उन्हें ‘इमर्जिंग क्रिकेटर ऑफ द ईयर’ चुना.
लेकिन एक तेज गेंदबाज का सफर कभी आसान नहीं होता। करियर के बेहतरीन मोड़ पर रेणुका को बैक स्ट्रेस फ्रैक्चर (Back Stress Fracture) हो गया, जिसके कारण वह 6 महीने तक क्रिकेट से दूर रहीं. चोट से उबरने के दौरान नेशनल क्रिकेट एकेडमी (NCA) में उन्होंने जसप्रीत बुमराह से गेंदबाजी के कई अहम गुर सीखे. वापसी करते ही उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ 15 रन देकर 5 विकेट झटके और WPL में RCB के लिए भी कमाल का प्रदर्शन किया. हालांकि, यह चोट दोबारा लौट आई और उन्हें फिर से 6 महीने के मुश्किल रिहैब और अकेलेपन से गुजरना पड़ा. ऐसे मुश्किल वक्त में कोच अमोल मजूमदार लगातार फोन कर उनका हौसला बढ़ाते रहे.
वर्ल्ड कप फाइनल में मचाया गदर और हाथ पर बना वो ‘खास टैटू’
रेणुका की कड़ी मेहनत का सबसे बड़ा फल उन्हें तब मिला जब हाल ही में हुए वनडे वर्ल्ड कप के फाइनल में उन्होंने साउथ अफ्रीका के खिलाफ सिर्फ 28 रन देकर घातक गेंदबाजी की और भारत को पहली बार वनडे वर्ल्ड कप का चैंपियन बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई.
रेणुका की गेंदबाजी को जो चीज सबसे अलग और इमोशनल बनाती है, वह है उनके सीधे हाथ की कलाई पर बना हुआ टैटू. इस टैटू में एक पिता अपनी छोटी सी बेटी को हवा में उछालकर प्यार से खेलता हुआ नजर आ रहा है. इस टैटू के ऊपर उनके पिता की जन्म तारीख और नीचे उनके निधन की तारीख लिखी हुई है. रेणुका जब भी रन-अप लेने के लिए तैयार होती हैं, तो गेंदबाजी करने से ठीक पहले उनकी नजर इस टैटू पर पड़ती है. वह मानती हैं कि मैदान पर उनका हर एक विकेट, आसमान से मिल रहा उनके पिता का आशीर्वाद है.
हिमाचल के छोटे से गांव से आकर दुनिया पर छा जाने वाली रेणुका सिंह ठाकुर की यह कहानी हमें सिखाती है कि अगर इरादे पक्के हों और परिवार का साथ हो, तो किस्मत भी आपके आगे घुटने टेक देती है. अपनी मां के त्याग और भाई की कुर्बानी को रेणुका ने जाया नहीं होने दिया. आज पूरा देश इस बेटी के जज्बे को सलाम कर रहा है।
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