Mohammed Shami Success Story: कैसे एक किसान का बेटा तंगहाली और लोकल पॉलिटिक्स को पछाड़कर बना इंडिया का नंबर-1 ‘स्विंग किंग’!

Mohammed Shami Success Story: कैसे एक किसान का बेटा तंगहाली और लोकल पॉलिटिक्स को पछाड़कर बना इंडिया का नंबर-1 ‘स्विंग किंग’!

भारतीय क्रिकेट इतिहास में जब भी सबसे खतरनाक तेज गेंदबाजी और जादुई ‘रिवर्स स्विंग’ (Reverse Swing) की बात होती है, तो हर किसी के जुबान पर सबसे पहला नाम मोहम्मद शमी (Mohammed Shami) का ही आता है। लेकिन आज दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाजों के स्टंप उखाड़ने वाले शमी का यहाँ तक पहुँचने का सफर बेहद दर्दनाक और संघर्षों से भरा रहा है। एक छोटे से गाँव के किसान के बेटे से लेकर भारतीय टीम के सबसे भरोसेमंद गेंदबाज बनने की यह कहानी हर किसी को भावुक कर देती है।

Mohammed Shami Success Story

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अमरोहा के गाँव से मुरादाबाद तक का सफर: पिता का अनोखा सपना

मोहम्मद शमी का जन्म 3 सितंबर 1990 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के एक छोटे से गाँव सहसपुर में हुआ था। उनके पिता, तौसीफ अली, पेशे से एक साधारण किसान थे।

पिता का खुद का जुनून: तौसीफ अली अपने जमाने में खुद भी गाँव के स्तर पर एक तेज गेंदबाज हुआ करते थे। जब उन्होंने अपने बेटे शमी के भीतर गेंद को तेजी से फेंकने का कुदरती हुनर देखा, तो उन्होंने ठान लिया कि वह अपने बेटे का सपना हर हाल में पूरा करेंगे।

22 किलोमीटर का कड़ा सफर: गाँव में अच्छी क्रिकेट पिच और कोचिंग की सुविधा नहीं थी। इसलिए शमी को सही ट्रेनिंग दिलाने के लिए उनके पिता उन्हें हर रोज अपने गाँव से 22 किलोमीटर दूर मुरादाबाद लेकर जाते थे। वहीं मुरादाबाद में उनकी मुलाकात उनके पहले गुरु और कोच बदरुद्दीन सिद्दीकी से हुई।

तंगहाली और पुरानी गेंदों से ‘रिवर्स स्विंग’ की अनोखी प्रैक्टिस

शुरुआती दिनों में शमी के परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वे रोज अभ्यास के लिए महंगी चमचमाती नई लेदर गेंदें खरीद सकें। लेकिन शमी के जुनून के आगे संसाधनों की यह कमी बहुत छोटी साबित हुई।

पुरानी गेंदों का जुगाड़: जब क्लब के मैच खत्म हो जाते थे, तो शमी मैच के आयोजकों (Organizers) के पास जाकर उनसे पुरानी और घिसी हुई गेंदें मांग लिया करते थे।

घंटों की कड़ी मेहनत: शमी उन पुरानी गेंदों को एक तरफ से रगड़कर चमकाते (Shine) थे और मुरादाबाद के मैदान पर कड़ी धूप में घंटों रिवर्स स्विंग कराने की जिद के साथ प्रैक्टिस किया करते थे। उनके कोच के मुताबिक, शमी जैसा आज्ञाकारी, मेहनती और अनुशासित खिलाड़ी उन्होंने अपने पूरे करियर में नहीं देखा, जिसने कभी एक दिन भी अपनी ट्रेनिंग मिस नहीं की।

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यूपी सिलेक्शन में पॉलिटिक्स और रातों-रात कोलकाता का रुख

जब शमी अपनी शानदार स्विंग गेंदबाजी से लोकल क्रिकेट में तहलका मचा रहे थे, तब उन्होंने उत्तर प्रदेश की अंडर-19 टीम (UP Under-19) के लिए ट्रायल्स दिए। मैदान पर कमाल का प्रदर्शन करने के बाद भी चयनकर्ताओं ने उन्हें टीम में जगह नहीं दी। उनके कोच के अनुसार, इसके पीछे पूरी तरह से लोकल लेवल की गंदी राजनीति (Politics) जिम्मेदार थी।

करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट: उत्तर प्रदेश टीम में रिजेक्ट होने के बाद शमी का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था। लेकिन उनके कोच बदरुद्दीन जानते थे कि इस लड़के में देश के लिए खेलने का दम है। वह शमी का एक साल भी बर्बाद नहीं होने देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने शमी को कोलकाता (पश्चिम बंगाल) भेजने का एक बड़ा फैसला लिया।

कोलकाता का संघर्ष और देवब्रत दास का सहारा

जब 2005-06 में शमी कोलकाता पहुँचे, तो उनके पास न तो रहने का कोई ठिकाना था और न ही जेब में पैसे। वह डलहौजी क्लब के लिए ₹500 के भत्ते पर मैच खेला करते थे।

भगवान बनकर आए देवब्रत दास: क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल (CAB) के तत्कालीन अधिकारी देवब्रत दास की नजर जब नेट्स पर गेंदबाजी कर रहे शमी पर पड़ी, तो वह उनकी रफ्तार देखकर दंग रह गए।

अपने घर में दी जगह: शमी की मजबूरी और उनके टैलेंट को देखकर देवब्रत दास ने उन्हें न सिर्फ अपने घर में रहने की जगह दी, बल्कि उनकी डाइट, कपड़ों और पैसों का पूरा खर्च उठाया। उन्होंने शमी को एक पिता की तरह संभाला और बंगाल की टीम में जगह दिलाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। इसके बाद शमी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 2013 में भारतीय टीम की जर्सी पहनकर दुनिया पर छा गए।

(Conclusion)

मोहम्मद शमी की यह दास्तां हमें सिखाती है कि अगर आपके सपनों में सच्चाई है और आप बिना रुके कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार हैं, तो कोई भी गंदी राजनीति, गरीबी या सुविधाओं की कमी आपका रास्ता नहीं रोक सकती। आज जब शमी मैदान पर दौड़ते हैं, तो वह सिर्फ एक गेंदबाज नहीं होते, बल्कि करोड़ों भारतीय युवाओं के अटूट हौसले की मिसाल होते हैं।

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