Palwankar Baloo : वो महान क्रिकेटर , जिसे पिच पर तो मिला सम्मान , लेकिन डाइनिंग टाइम टेबल पर नहीं देखी प्लेयर्स की इंसानियत
भारतीय क्रिकेट का इतिहास कई महान खिलाड़ियों से और उनके शानदार प्रदर्शन , रिकॉर्ड से भरा पड़ा है । लेकिन कुछ ऐसी कहानियां है जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता । ऐसी ही यक अनकही कहानी है palwankar baloo की , जो पहले भारतीय दलित क्रिकेटर बने । आइए आपको बताते है पूरी खबर
Palwankar Baloo

साल 1900 का वो दौर और मैदान का जादू
1900 के दशक में, पलवांकर बालू एक ‘गॉड-टीयर’ (God-tier) लेफ्ट आर्म स्पिनर थे। उनकी गेंदबाजी के आगे बड़े बड़े खिलाड़ी घुटने टेक देते थे । उस दौर में जब क्रिकेट उच्च जाति के खिलाड़ियों का दबदबा था, बालू ने अपनी प्रतिभा के दम पर न केवल अपनी जगह बनाई, बल्कि दुनिया को अपनी कला का लोहा भी मनवाया। बालू बहुत टैलेंटेड क्रिकेटर थे।
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इंग्लैंड का वो ऐतिहासिक दौरा साल 1911
वर्ष 1911 में भारतीय टीम के ऐतिहासिक इंग्लैंड दौरे पर पलवांकर बालू ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने वो करके दिखाया जो उस समय कोई क्रिकेटर सोच भी नहीं सकता था ।उस दौरे पर कुल 114 विकेट लिए, जो उस समय किसी के लिए भी कल्पना से परे था। उन्होंने साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी जाति या धर्म की मोहताज नहीं होती। अपने पूरे प्रथम श्रेणी (First-Class) करियर में, उन्होंने कुल 179 विकेट हासिल किए।
टीम की बीच दूरियां और उस समय समाज की कड़वी सच्चाई
Palwankar baloo की कहानी का दूसरा पहलू इससे विपरीत है जहां मैदान पर उन्हें सम्मान मिलता टीम के खिलाड़ी उन पर गर्व करते थे । करते थे, तो पूरी टीम उनके प्रदर्शन पर गर्व करती थी, लेकिन जैसे ही खेल रुकता और ‘टी-ब्रेक’ (Tea Break) होता, तो एक अमानवीय स्थिति पैदा हो जाती थी।
- उनकी अपनी टीम के साथी उन्हें छूने तक से परहेज करते थे।
- पूरी टीम पवेलियन में एक साथ बैठकर चाय पीती और खाना खाती थी, जबकि बालू को बाहर एक अलग टेबल पर बैठकर खाना पड़ता था।
यह उस दौर की सबसे बड़ी ऐतिहासिक समस्या थी, जहाँ एक तरफ खेल के मैदान पर उन्हें खिलाड़ी के रूप में स्वीकार किया गया, वहीं दूसरी तरफ उनके साथी खिलाड़ी सामाजिक ऊंच-नीच के कारण उन्हें सामान्य मानवीय सम्मान भी नहीं देते थे।
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जब विरोधियों ने दिखाई इंसानियत और दिया सम्मान
सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह थी कि जिन्हें बालू ने मैदान पर हराया, यानी ब्रिटिश प्रशासक और विरोधी खिलाड़ी, उन्होंने भी बालू के प्रति बहुत अधिक सम्मान दिखाया। वे अक्सर उनके साथ कहीं ज्यादा मानवीय गरिमा (human dignity) और सम्मान के साथ पेश आते थे, जो उनके अपने साथी खिलाड़ियों की तरफ से कभी नहीं मिला।
पलवांकर बालू केवल एक क्रिकेटर नहीं थे; वे सामाजिक असमानता के खिलाफ एक मूक योद्धा थे। उन्होंने अपनी गेंदबाजी से न केवल विकेट लिए, बल्कि उस भेदभावपूर्ण सिस्टम को भी पिच पर कुचल दिया। आज जब हम भारतीय क्रिकेट की ऊंचाई देखते हैं, तो हमें उन नींव के पत्थरों को जरूर याद रखना चाहिए जिन्होंने भेदभाव की बेड़ियों को तोड़कर रास्ता बनाया था।
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