Lall Singh Life story : भारतीय क्रिकेट का वो ‘ जवाज़’ जो जापानी जेल से भाग निकला था; लाल सिंह, जिनके जीवन की कहानी रोंगटे खड़े कर देगी
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं, लेकिन लाल सिंह (Lall Singh) का नाम उन पन्नों में कहीं खो गया है। 1932 में जब भारत ने अपना पहला टेस्ट मैच खेला, तो लाल सिंह न केवल अपनी फील्डिंग के लिए चर्चा में आए, बल्कि उनकी जीवन यात्रा भी उतनी ही प्रेरणादायक और उतार-चढ़ाव भरी रही।लाल सिंह भारत के लिए खेलने वाले पहले ‘ग्लोबल’ क्रिकेटर थे।
Lall Singh Life story

मलेशिया से भारत का सफर और ट्रायल की कहानी
लाल सिंह का जन्म 16 दिसंबर 1909 को मलेशिया (कुआलालंपुर) के एक समृद्ध गिल जाट परिवार में हुआ था। उनके परिवार की वहां रबर के बागान और खदानें थीं।
शिक्षा: उन्होंने कुआलालंपुर के प्रतिष्ठित ‘विक्टोरिया इंस्टीट्यूशन’ से पढ़ाई की, जहाँ उन्होंने क्रिकेट की बारीकियां सीखीं।
लॉर्ड्स टेस्ट: जब फील्डिंग बनी पहचान
लाल सिंह को उनकी बल्लेबाजी से ज्यादा उनकी ‘चीते जैसी फुर्ती’ के लिए टीम में चुना गया था। वे उस दौर के पहले Specialist Fielder थे।
सांप जैसी लचीली चाल: विजडन ने उनके बारे में लिखा था कि “वे मैदान पर किसी सांप की तरह रेंगते (glide) थे।” वे बिना रुके गेंद पकड़कर सीधे विकेटकीपर के दस्तानों पर सटीक थ्रो मारते थे।
ऐतिहासिक रन आउट: 1932 के टेस्ट में उन्होंने इंग्लैंड के दिग्गज फ्रैंक वूली को जिस तरह रन आउट किया, उसने अंग्रेजों के मन में भारतीय फील्डिंग का खौफ पैदा कर दिया था।
निजी जीवन के रोचक पहलू: ‘ताज महल होटल’ और प्रेम कहानी
लाल सिंह की निजी जिंदगी काफी दिलचस्प थी।
शादी: भारत में रहने के दौरान उन्हें मुंबई के मशहूर ‘ताज महल होटल’ की एक सिंगर से प्यार हो गया और उन्होंने उनसे शादी कर ली। और पेरिस चले गए वहां पर उनकी पत्नी के साथ उन्होंने एक आलीशान नाइटक्लब भी चलाया । हालांकि उनका ये रिश्ता ज्यादा लम्बा नहीं टिक पाया और दूसरे विश्व युद्ध शुरू होने से ठीक पहले, वे 1939 में मलेशिया लोट आए।
जापानी कैद और रोंगटे खड़े करने वाला ‘जेल ब्रेक’
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब जापान ने मलेशिया पर कब्जा किया, तो लाल सिंह को युद्ध बंदी (Prisoner of War) बना लिया गया। उन्हें बोर्नियो के नरक जैसे लेबर कैंप में डाल दिया गया था। लाल सिंह के भाइयों ने ब्रिटिश अधिकारी को भगाने में मदद की थी तो उनके दो भाइयों को फांसी दे दी गई । तीन साल नरक जैसी जिंदगी ने उन्हें एक कंकाल में बदल दिया अगस्त 1945 में जब जापान में परमाणु हमले की अफरा – तफरी मची तो लाल सिंह भाग निकले जब वे वापस कुआलालंपुर लौटे तो उनकी सगी मां पहचान नहीं पाई ।
आलीशान जिंदगी से ‘ग्राउंड्समैन’ तक का सफर
लाल सिंह का अंतिम समय काफी गरीबी में बीता।
सब कुछ खो दिया: युद्ध के बाद उनकी पारिवारिक संपत्ति और रबर के बागान छिन गए।
गुमनामी में मौत: जिस खिलाड़ी ने लॉर्ड्स में अंग्रेजों को अपनी फील्डिंग से डराया था, उसने अपने आखिरी दिनों में कुआलालंपुर के सेलंगोर क्रिकेट क्लब में ग्राउंड्समैन (मैदान की देखरेख करने वाला) के रूप में काम किया। 1985 में इसी गुमनामी में उनकी मृत्यु हो गई।
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